India-Pakistan विभाजन का एक रोचक किस्सा  (An interesting story of India-Pakistan partition)



India-Pakistan विभाजन (India-Pakistan partition) - 3 जून 1947, यह वह तारीख थी जब भारत के 40 करोड़ लोगों की आजादी का दिन तय हुआ। और साथ ही मोहम्मद अली जिन्ना के पाकिस्तान बनाने का नापाक सपना भी पूरा हुआ। इस दिन तारीख तय की गई 15 अगस्त 1947। भारत पाकिस्तान के बंटवारे के लिए महज 73 दिन का वक्त दिया गया था। लेकिन यह बंटवारा इतना भी आसान नहीं था। जमीन का बंटवारा, धर्मो का बंटवारा, नदियों का बंटवारा, भारत में पड़े नकदी नोट का विभाजन। इसके अलावा रिजर्व बैंक के तहखाने में पड़ी सोने की ईंटें, मैली कुचैली नोट और भारत के सुदूरतम नागा आदिवासियों के इलाके में एक बंगले में डिप्टी कमिश्नर के संदूक में पड़े एक- एक डाक टिकट का बंटवारा होना था।


Friends आज आप पढ़ेंगे कहानी, उन तमाम विभाजन का जो भारत-पाकिस्तान के बंटवारे  के वक्त किए गए।


India-Pakistan विभाजन का एक रोचक किस्सा 


India-Pakistan विभाजन का एक रोचक किस्सा



India-Pakistan विभाजन का एक रोचक किस्सा 
(An interesting story of India-Pakistan partition)


भारत-पाकिस्तान के बंटवारे (India-Pakistan partition) का यह किस्सा बयां किया गया है डोमिनिक लापीएर और लरी कॉलिन्स की किताब freedom at midnight मे। इस बंटवारे के लिए  दो अनुभवी अधिकारियों को चुना गया। जिसमें से एक थे, एच-एम पटेल और दूसरे थे चौधरी मोहम्मद अली। उन दोनों अधिकारियों के नीचे कई छोटे बड़े अधिकारी थे, जो अलग-अलग जगहों से रिपोर्ट बनाकर इन दोनों अधिकारियों के पास भेजते थे। इन रिपोर्ट के आधार पर यह दोनों अधिकारी बंटवारे की सिफारिशें तैयार करते थे। जिन्हें आगे विभाजन परिषद के पास भेजा जाता था। जिसके अध्यक्ष थे लॉर्ड माउंटबेटन।


इंडिया-पाकिस्तान विभाजन में "देश के नाम" का बंटवारा (Partition of "country name" in India-Pakistan partition)


इस बंटवारे की शुरुआत हुई देश के नाम से। सबसे पहले कांग्रेस ने इस बहुमूल्य संपत्ति की मांग की। और यह संपत्ति थी देश का नाम "भारत"। असल में कांग्रेस ने उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था जिसमें उसे भारत का नाम बदलकर हिंदुस्तान रखने की सलाह दी गई थी। कांग्रेस ने तर्क दिया कि पाकिस्तान भारत को छोड़कर जा रहा है, इसलिए संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं में भारत की असल हैसियत के हकदार हम ही हैं।

India-Pakistan विभाजन मे पैसों का बंटवारा (Money sharing in India-Pakistan division)


इस बंटवारे के दौरान सबसे ज्यादा तू-तू मैं-मैं हुई पैसे को लेकर। यह झगड़ा इतना बढ़ गया कि चौधरी मोहम्मद और एच एम पटेल को सरदार पटेल के घर में एक कमरे में तब तक बंद कर दिया गया जब तक कि वे एक नतीजे पर नहीं पहुंचे। खैर कई दिनों की सौदेबाजी के बाद यह दोनों इस नतीजे पर पहुंचे कि भारत के बैंकों में पड़ा पैसा और अंग्रेजो से मिलने वाले पैसों में से 17.5% पैसा पाकिस्तान को दिया जाए। और इसके बदले में पाकिस्तान भारत के कर्ज़ का 17.5% पैसा चुकाएगा। इसके अलावा भारत के सरकारी दफ्तरों में पड़ी चल संपत्ति में से 80% प्रतिशत हिस्सा भारत के लिए और 20% हिस्सा पाकिस्तान को देने के लिए तय किया गया।

फिर क्या था, भारत के हर दफ्तर में मेज, कुर्सियां और टाइपराइटर तक की गिनती होनी शुरू हो गई। इन सभी चीजों के बंटवारे के लिए बहस तो छोड़िए, लड़ाइयां तक हुई। लेकिन एक चीज के लिए कभी कोई बहस नहीं हुई और वह थी शराब। जितनी भी शराब थी, वह भारत को दे दी जाती और इसके बदले में पाकिस्तान को कुछ धन दे दिया जाता था।

विधवाओं को पेंशन कौन देगा? (Who will give pension to widows?)


इस बंटवारे के दौरान एक सवाल और उठा कि समुंदर में मारे गए जहाजियों के विधवाओं को पेंशन कौन देगा? क्या सभी मुस्लिम बेवाओं को पेंशन पाकिस्तान देगा? और क्या सभी हिंदू विधवाओं को पेंशन भारत की ओर से दी जाएगी?

सड़कों और रेल लाइनों का बंटवारा (Division of roads and rail lines)


यही नहीं, भारत की 18077 मिल सड़कों में से 4913 मिल सड़क और 26421 मील रेल लाइनों में से 7112 मिल की रेल लाइन पाकिस्तान के हिस्से में आई। जिसके बाद यह बहस छिड़ गई कि इन महकमो की मशीनरी जैसे बुलडोजर, रेल इंजन और बाकी सामान आदि दोनों मुल्कों में तय किए गए 80 और 20 प्रतिशत के आधार पर बांटा जाएगा या फिर जिसके हिस्से में जितनी सड़कें और रेल लाइन आई है उसके आधार पर बांटा जाएगा।

पुस्तकों का बंटवारा (Partition of books) 


यही नहीं भारत की लाइब्रेरी में भी पडी़ पुस्तकों के बंटवारे में भी दोनों मुल्कों में पेच फंस गया। इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका को भारत और पाकिस्तान में इस तरह बांटा गया कि पहला खंड भारत को दिया गया और फिर दूसरा खंड पाकिस्तान को दिया गया। और फिर तीसरा खंड भारत को दे दिया गया। यहां तक कि लाइब्रेरी में पड़े शब्दकोश को भी आधा-आधा फाड़कर भारत और पाकिस्तान में बांट दिया गया।


"गुप्तचर विभाग" जिसे विभाजन से बाहर रखा गया ("Intelligence Department" excluded from division)


विभाजन के इस प्रक्रिया से एक चीज को बाहर रखा गया और वह था भारत का गुप्तचर विभाग। भारत के गृह विभाग ने दूरदर्शिता से यह फैसला लिया कि भारत के गुप्तचर विभाग में किसी तरह की कमी नहीं की जाएगी और उसके officers इस बात पर अड़े रहे की इस विभाग की फाइल तो छोड़िए स्याही तक भी हम पाकिस्तान नहीं जाने देंगे।


नोटों की छपाई करने वाली प्रेस का बंटवारा


पाकिस्तान एक नया मुल्क बना था तो जाहिर सी बात है कि उसकी एक नई करेंसी भी छपनी थी। लेकिन उस वक्त भारत में सिर्फ एक ही प्रेस थी जहां पर नोटों की छपाई होती थी और भारत ने उस प्रेस को पाकिस्तान से साझा करने से इंकार कर दिया। जिसके बाद पाकिस्तान को भारतीय नोटों पर ही अपनी पाकिस्तानी मोहर लगाकर थोड़े वक्त के लिए काम चलाउ करेंसी बनानी पड़ी थी।


India-pakistan विभाजन में लोगों की राय (Public opinion in India-pakistan division)


बंटवारे का माहौल इतना चरम पर था की कुछ पाकिस्तानी मुसलमान चाहते थे कि ताजमहल को तोड़कर पाकिस्तान भिजवा दिया जाए। वही कुछ हिंदू साधुओं का कहना था कि सिंधु नदी जिसके तट पर बैठकर वेद लिखे गए थे, वह किसी भी हालात में भारत को ही मिलनी चाहिए।


वायसराय भवन के अस्तबल में हुआ नाटकीय विभाजन (Dramatic partition in the stables of Viceroy building)


सबसे नाटकीय विभाजन हुआ वायसराय भवन के अस्तबल में। इस अस्तबल की शान थी 12 घोड़ा गाड़ियां जिस पर सोने और चांदी के तरह-तरह की सजावट हो रखे थे। इन गाड़ियों में वायसराय और उनके मेहमानों को दिल्ली की सैर करवाई जाती थी। लेकिन इनमें से छह गाड़ियों की सजावट सुनहरी थी और 6 गाड़ियों की सजावट रूपहली थी। इन गाड़ियों के सेट को तोड़ना भी बड़ी दुखद बात होती। इसलिए माउंटबेटन के एडीसी पीटर हॉज ने यह तय किया कि सिक्का उछाल कर इस बात का फैसला किया जाएगा कि किसके हिस्से में सुनहरी गाड़ी आएगी और किसके हिस्से में रुपहली। इसके बाद जब वह सिक्का खनखनाता हुआ अस्तबल के फर्श पर गिरा तो भारत की तरफ से कमांडर मेजर गोविंद सिंह उछल पड़े। सुनहरी गाड़ियों का फैसला भारत के हक में हुआ था।


India-Pakistan विभाजन का दिल पसीज देने वाला बंटवारा (Heart-breaking partition of India-Pakistan partition)


लेकिन इसके अलावा एक और दिल पसीज देने वाला बंटवारा अभी बाकी था। यह बंटवारा था उन लाखों मुसलमानों, हिंदू और सिखों का जो भारत की गौरवशाली संस्था भारतीय सेना का हिस्सा थे। भारतीय सेना के दो तिहाई सैनिक भारत के हिस्से में आने थे और एक तिहाई सैनिक पाकिस्तान के हिस्से में। बाकी चीजों की तरह इन वीरों का भी बंटवारा तय था। और इसके साथ ही 25 लाख सैनिकों की गौरवशाली परंपरा का अंत हो जाना था। जुलाई के अंत में भारतीय सेना को एक-एक फॉर्म दिया गया जिसमे उन्हें लिखना था कि वह भारत के साथ जाना चाहते हैं या पाकिस्तान के साथ। हिंदू और सिख फौजियों को इससे कोई समस्या नहीं थी। लेकिन मुस्लिम फौजी जिनका बंटवारे के बाद घर भारत में छूट जाने वाला था उनके लिए यह कागज का टुकड़ा महत्वपूर्ण था। इसी पीड़ा से गुजर रहे थे मेजर याकूब खान, जो रियासत रामपुर के रहने वाले थे। सारी रात वह अपने घर की यादों को सीने से लगाए सोचते रहे की करे तो करे क्या। लेकिन अंत में उन्होंने अपने दिल पर पत्थर रखकर पाकिस्तान को चुना। और अपनी मां और परिवार को छोड़कर पाकिस्तान जाने का फैसला किया।

अगली सुबह बेटे को घर से रुखसत करते हुए मां ने उसे कुरान के नीचे से गुजारा और वह पवित्र किताब उसके हाथ में दे दी। इसके साथ ही उसके सर पर कुछ पढ़कर भी फूंका ताकि उसकी दुआ हमेशा उसके बच्चे के साथ रहे। मेजर याकूब  खान को लग रहा था कि वह अपनी मां से मिलने आते जाते रहेंगे। लेकिन उनका यह सोचना गलत था। वह ना हीं दोबारा कभी अपने मां से मिल पाया और ना तो कभी अपने पुश्तैनी घर वापस आ पाया। इसके कुछ ही महीनों बाद वह कश्मीर में पाकिस्तानी बटालियन की अगुवाई कर रहा था। और जो भारतीय फौज की टुकड़ी उस से लोहा ले रही थी उनमें एक टुकड़ी गढ़वाल रेजीमेंट की भी शामिल थी। उस रेजीमेंट के कमांडर भी याकूब खां की तरह मुसलमान थे। लेकिन फर्क सिर्फ इतना था कि साल 1947 में उन्होंने अपनी मातृभूमि भारत को चुना। और यह विडंबना ही थी कि वह भी रियासत रामपुर के ही रहने वाले थे। याकूब खान की तरह उनके नाम के पीछे भी खान ही लगता था। और उनका नाम था यूनुस खान, जो याकूब खान के बड़े भाई थे। 2 मुल्कों के बंटवारे ने दो सगे भाइयों को युद्ध के मैदान में एक दूसरे के सामने लाकर खड़ा कर दिया था।


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